
अगर आपसे कोई पूछे कि “पैसा क्यों खत्म हो जाता है?”, तो ज़्यादातर लोग कहेंगे – महंगाई, कम सैलरी, या ज़्यादा ज़िम्मेदारियाँ।
लेकिन सच्चाई यह है कि कई बार समस्या कम कमाई की नहीं, बल्कि गलत तरीके से पैसे रखने और खर्च करने की होती है।
मैंने अपने आसपास ऐसे कई लोगों को देखा है जिनकी इनकम ठीक-ठाक है, फिर भी महीने के आख़िर में हालात टाइट हो जाते हैं। वजह सिर्फ़ एक है —
सारी इनकम और खर्च एक ही बैंक अकाउंट में घुली हुई होती है।
यहीं से “4 बैंक अकाउंट सिस्टम” की ज़रूरत समझ में आती है।
4 बैंक अकाउंट सिस्टम आखिर है क्या?
यह कोई जटिल फाइनेंस थ्योरी नहीं है।
यह बस पैसे को चार अलग-अलग हिस्सों में बाँटने की एक आदत है, ताकि हर रुपया अपने सही काम में लगे।
ये चार अकाउंट होते हैं:
- इनकम अकाउंट
- सेविंग अकाउंट
- आउटगोइंग अकाउंट
- स्पेंडिंग अकाउंट
हर अकाउंट का काम तय है, और यहीं से आपकी फाइनेंशियल लाइफ आसान होने लगती है।
1. इनकम अकाउंट: जहाँ पैसा आता है, रुकता नहीं
इनकम अकाउंट को आप अपने पैसों का एंट्री गेट समझिए।
यहीं पर आता है:
- आपकी सैलरी
- बिज़नेस की कमाई
- फ्रीलांस या प्रोफेशनल फीस
- कोई और एक्स्ट्रा इनकम
लेकिन एक बात बहुत ज़रूरी है —
👉 यह अकाउंट पैसे जमा करने के लिए नहीं है।
जैसे ही इनकम आए, उसे तुरंत बाकी तीन अकाउंट्स में बाँट देना चाहिए।
अगर पैसा यहीं पड़ा रहेगा, तो वही पुरानी गलती दोहराई जाएगी।
2. सेविंग अकाउंट: आपका भविष्य यहीं बनता है
अगर किसी एक अकाउंट को सबसे ज़्यादा गंभीरता से लेना है, तो वो यही है।
सेविंग अकाउंट का मतलब सिर्फ़ FD या पैसा जमा करना नहीं है।
यहीं से बनता है आपका:
- इमरजेंसी फंड
- बच्चों की पढ़ाई का पैसा
- रिटायरमेंट का प्लान
- म्यूचुअल फंड और स्टॉक निवेश
- गोल्ड या ETF जैसी सेफ इन्वेस्टमेंट
मैं हमेशा एक बात कहता हूँ —
जो पैसा पहले नहीं बचाया गया, वो कभी नहीं बचेगा।
इसलिए इनकम आते ही कम से कम 20–30% सीधे सेविंग अकाउंट में जाना चाहिए।
बचे हुए पैसों में ही ज़िंदगी चलाइए।
3. आउटगोइंग अकाउंट: ज़िम्मेदारियों का सही हिसाब
यह अकाउंट उन खर्चों के लिए है जिन्हें आप टाल नहीं सकते।
जैसे:
- घर का किराया या EMI
- बिजली, पानी, गैस बिल
- इंटरनेट, मोबाइल पोस्टपेड
- लोन की किश्तें
- ऑटो-डेबिट खर्च
इस अकाउंट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि
आपको हर महीने पता रहता है — कितना पैसा तो जाना ही जाना है।
न EMI बाउंस का डर,
न बिल भूलने की टेंशन।
4. स्पेंडिंग अकाउंट: जहाँ ज़िंदगी चलती है
यह अकाउंट सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है, और सबसे ज़्यादा गड़बड़ भी यहीं होती है।
इससे खर्च होते हैं:
- पेट्रोल या ट्रांसपोर्ट
- रोज़मर्रा की शॉपिंग
- बाहर खाना
- मोबाइल रिचार्ज
- छोटे-मोटे खर्च
इस अकाउंट का सबसे सख़्त नियम है:
👉 पैसा खत्म = खर्च खत्म।
यही नियम आपको धीरे-धीरे फाइनेंशियल डिसिप्लिन सिखाता है।
यह सिस्टम सच में काम क्यों करता है?
क्योंकि इसमें:
- पैसा अलग-अलग काम के लिए अलग रखा जाता है
- सेविंग पहले होती है, खर्च बाद में
- फालतू खर्च अपने-आप कम हो जाते हैं
- निवेश एक आदत बन जाता है
- पैसों को लेकर तनाव घटता है
यह कोई रातों-रात अमीर बनाने वाला फार्मूला नहीं है,
लेकिन धीरे-धीरे मजबूत फाइनेंशियल बेस ज़रूर बना देता है।
भारत में इसे अपनाना कितना मुश्किल है?
बिल्कुल भी नहीं।
- चार अलग बैंक होना ज़रूरी नहीं
- एक ही बैंक में चार अकाउंट चल सकते हैं
- UPI और ऑटो-ट्रांसफर से पूरा सिस्टम अपने-आप चलेगा
एक बार सेटअप हो गया,
फिर पैसे खुद मैनेज होने लगते हैं।
आखिर में एक सच्ची बात
वित्तीय आज़ादी का मतलब करोड़पति बनना नहीं है।
वित्तीय आज़ादी का मतलब है:
- बिल आने से डर न लगना
- इमरजेंसी में किसी से उधार न माँगना
- भविष्य को लेकर सुकून महसूस करना
और यह सब सही सिस्टम से आता है, सिर्फ़ ज़्यादा कमाने से नहीं।
अगर आप आज से 4 बैंक अकाउंट सिस्टम अपनाते हैं,
तो यकीन मानिए —
कुछ साल बाद आपका पैसा आपकी ज़िंदगी आसान बना रहा होगा।